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दूसरों को बचाने वाला शशांक खुद 'अग्नि' में समाया
कोलकाता। आनंदपुर के नाजिराबाद इलाके में स्थित जुड़वा गोदामों में लगी भीषण आग को 39 घंटे से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन वहां पसरा सन्नाटा और हवा में तैरती राख आज भी किसी डरावने मंजर की गवाही दे रही है। इस भीषण हादसे में अब तक आठ लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, लेकिन मलबे के ढेर के सामने अपनी सूजी हुई आंखों से चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठे परिजनों का सब्र अब टूटता जा रहा है। मलबे के भीतर दमकलकर्मी शवों के अवशेषों की तलाश में जुटे हैं, पर हालात ऐसे हैं कि मिलने वाले अवशेषों की पहचान कर पाना भी नामुमकिन साबित हो रहा है। इस त्रासदी की सबसे हृदयविदारक कहानी शशांक जाना की है। पूर्व मेदिनीपुर के शालिका धनिचक गांव का रहने वाला शशांक दूसरों की जान बचाने के चक्कर में खुद मौत के मुंह में समा गया।
चश्मदीदों और परिजनों के मुताबिक, रविवार की उस काली रात में सबसे पहले शशांक की ही नींद टूटी थी। उसने गोदाम में भड़कती लपटों को देख शोर मचाया और वहां सो रहे करीब 18 मजदूरों को जगाकर बाहर निकालने की कोशिश की। शशांक का भतीजा सुशांत, जिसे उसने खुद जगाया था, ऊपर से नीचे कूदकर अपनी जान बचाने में सफल रहा, लेकिन सबको बचाने की फिक्र करने वाला शशांक फिर कभी वापस नहीं लौटा। शशांक के भाई अमल जाना अब भी गोदाम के बाहर इस उम्मीद में बैठे हैं कि शायद उनका भाई कहीं सुरक्षित हो, जबकि सच्चाई मलबे की परतों के नीचे दफन है।
हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लापता लोगों में एक 12वीं का छात्र देबादित्य दिंदा भी शामिल है, जो अपनी परीक्षा से पहले कुछ पैसे कमाने के लिए डेकोरेटर्स के काम से यहां आया था। उसके चाचा जनमेंजय बताते हैं कि शशांक ने देबादित्य को भी जगाया था, लेकिन धुएं और आग के गुबार में वह कहां खो गया, किसी को नहीं पता। इसी तरह पश्चिम मेदिनीपुर के पिंगला इलाके से आए कृष्णेंदु धाड़ा, अनुप प्रधान और विश्वजीत साहू के परिवारों में भी मातम पसरा है। इनमें से किसी का डेढ़ साल का बच्चा है तो किसी की पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है। पिंगला के विधायक अजीत मैती ने इसे एक बेहद दुखद हादसा बताते हुए पीडि़त परिवारों को हर संभव मदद का भरोसा दिलाया है। मंगलवार को कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने घटनास्थल का दौरा किया और खयादह-2 पंचायत कार्यालय में जाकर शोकाकुल परिजनों से मुलाकात की।
प्रशासन का कहना है कि जले हुए शवों की स्थिति इतनी खराब है कि अब केवल डीएनए टेस्ट के जरिए ही उनकी पहचान संभव हो पाएगी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि गोदाम में मजदूरों के रहने के लिए प्लाईवुड के कच्चे कमरे बनाए गए थे और वहीं खाना भी पकता था, जो सुरक्षा के लिहाज से एक बड़े खतरे की तरह था। मंगलवार दोपहर तक मलबे से धुआं निकलता रहा और जैसे-जैसे समय बीत रहा है, अपनों के जिंदा लौटने की उम्मीद अब राख में तब्दील होती जा रही है।